महाभारत में जब भीष्म पितामह शर-शय्या पर थे, तब राजा युधिष्ठिर को धर्म के विषय में भगवान शिव और देवी पार्वती माता का संवाद सुनाते हैं।
एक बात मैं यह कहना चाहूँगा कि भगवान शिव एक ऐतिहासिक महापुरुष थे, जो देव-वर्ग में उत्पन्न हुए थे, सतयुग में आज से तकरीबन 37-38 लाख वर्ष पूर्व कम से कम।
भगवान शिव से भगवती पार्वती माता पूछती हैं कि धर्म का क्या लक्षण है, तब भगवान शिव कहते हैं कि धर्म के चार लक्षण हैं - अहिंसा, सत्य बोलना, सब प्राणियों पर दया करना और मन तथा इन्द्रियों पर नियन्त्रण रखना।
इस लेख में हम बात करेंगे भगवान शिव द्वारा निर्दिष्ट धर्म के तीसरे लक्षण दया के विषय पर।
महर्षि पतञ्जलि ने कहा, करुणा दया है, दुःखी को देखकर दया होनी चाहिए।
आज हम देखेंगे संसार में दुःखी कौन है और इससे भी पहले दया कौन कर सकता है। दया की भावना या जितने भी धर्म के लक्षण हैं, वह भावना कब आएगी? जब हमें विश्वास हो जाएगा कि सभी प्राणियों में मेरे जैसा आत्मा है और सभी प्राणी चेतन हैं। यह मशीन नहीं हैं, रोबोट नहीं हैं, जड़ नहीं हैं और एक परमात्मा की सत्ता भी है तथा उस परमात्मा के परिवार के सभी प्राणी सदस्य हैं। जब तक ऐसा विश्वास नहीं होगा, तब तक न तो दया होगी और न ही अहिंसा होगी। यन्त्र किसी पर दया नहीं करता है, रोबोट किसी पर दया नहीं करेगा, वह अपने स्वामी को ही मार डालेगा।
अगर संसार के लोग अपने को रोबोट समझते रहें, चेतना की सत्ता को नकारते रहें, तो उनमें धर्म के कोई लक्षण कभी नहीं हो सकते।
जो भी आज विज्ञान की बात करते हैं, अगर वे कहते हैं कि चेतना नहीं है, तो वे सबसे बड़े अज्ञानी हैं और उनका विज्ञान कभी सत्य को सामने नहीं ला पाएगा, चाहे कितना ही अनुसंधान कर लें। और जब तक उनके मन में यह विश्वास नहीं होगा कि चेतना है, चेतना के बिना न सृष्टि चल सकती है और न बन सकती है, कोई भी क्रिया नहीं हो सकती है।
जब कोई मनुष्य किसी को मारता है, तो वह सोचता है कि यह तो मेरा भोजन है, यह जड़ है। उसकी छटपटाहट, उसका चीत्कार, करुण क्रन्दन उसको सुनाई नहीं देता। उसे लगता है कि जैसे मशीन आवाज करती है, वैसे यह भी आवाज कर रहा है। रोबोट तो रोएगा नहीं, उसको दुःख नहीं होगा।
चेतना पर विश्वास अनिवार्य है। आज संसार में जो सुखी लोग हैं अथवा ऐश्वर्यसम्पन्न लोग हैं, उनको यह दिखाई नहीं देता कि दुःखी कौन है। हमारे देश के अनेक नेता, जो प्रधानमन्त्री हैं, मन्त्री हैं, या कोई बड़े अधिकारी हैं, या मुख्यमन्त्री हैं, या राष्ट्रपति अथवा राज्यपाल हैं, जब कहीं जाते हैं, तो उनको दुःखी दिखाई ही नहीं देते, क्योंकि उनको दुःखी लोगों से दूर ले जाया जाता है। उनके चारों ओर सुरक्षा-घेरा इसलिए किया जाता है ताकि वे सामान्य व्यक्ति से मिल भी न सकें, उस सामान्य व्यक्ति का दर्द उन्हें पता ही न चल सके।
कुछ सुरक्षा के लिए होता है और कुछ छिपाने के लिए भी होता है कि वे किसी गरीब को न देख सकें, गरीबी को न देख पाएँ।
अगर कोई अच्छा राजा है, अच्छा मन्त्री है, तो वह देखेगा तो करुणा भी आएगी और अगर करुणा आएगी तो उसी के अनुसार नीति बनाएगा। लेकिन नौकरशाही उनको देखने नहीं देती और निचले स्तर के नेता भी उनको नहीं देखने देते।
पहले राजा लोग सुरक्षा-घेरे में चलते थे, लेकिन सामान्य जनता से भी मिलते थे। कभी भी कोई याचक उनके द्वार पर घंटा बजाकर आ जाता था। आज की तरह अवरोधक नहीं थे कि 5-6 वर्ष पत्र लिखते रहो और कोई उत्तर ही न मिले। ऐसा पहले नहीं था।
कोई व्यक्ति निर्धनता से उठकर ऊपर पहुँचता है, वह भी अपना धरातल भूल जाता है।
आज देखें तो पुरुषार्थ से हीन लोग हैं, जो काम नहीं करना चाहते हैं, अनेक दुर्व्यसनों से ग्रस्त हैं, उनको तो गरीब होना चाहिए और वे होंगे ही। उन पर इस प्रकार दया नहीं होनी चाहिए। उन पर दया यह करनी चाहिए कि उनको सिखाएँ कि तुम ये दुर्व्यसन छोड़ो, उनको समझाएँ, क्योंकि कई बार निर्धनता बुद्धि हर लेती है।
अगर कोई गरीब मदिरा पी रहा है, तो उसको गाली दो और यदि धनी मदिरा पी रहा है, तो उसकी खुशामद करो, यह नीति ठीक नहीं है। गरीब व्यक्ति मदिरा पीता है तो वह मद्यप कहलाता है और धनी तथा पूँजीपति मदिरा पीता है तो वह बड़ा व्यक्ति कहलाता है। यह कैसा दृष्टिकोण है? यही पक्षपात है।
गरीब परिश्रम करता है और परिश्रम करके सारे दिन की कमाई की मदिरा पी लेता है, तो उसका जीवन कैसे चलेगा?
महात्मा विदुर ने धृतराष्ट्र से कहा था, दो प्रकार के व्यक्तियों को संसार में जीने का कोई अधिकार नहीं है। एक व्यक्ति वह है जो धनी होकर भी दया नहीं करता, त्याग नहीं करता और दूसरा वह है जो गरीब होकर भी परिश्रम नहीं करना चाहता।
दया के पात्र वे हैं जो पुरुषार्थी हैं, जो कुछ करना चाहते हैं। उनकी सहायता करें ताकि वे कुछ कर सकें, कुछ बन सकें। ऐसे ही खैरात बाँटना देशहित में नहीं है। मतों के लिए ऐसा करने से देश की अर्थव्यवस्था नष्ट होती है।
लेकिन आज जितना भी गरीबों को बाँटा जाता है, उसके कई गुना अधिक पूँजीपतियों को बाँटा जाता है। उनके लाखों-करोड़ों के ऋण माफ हो जाते हैं। किसानों और मजदूरों का थोड़ा-बहुत ऋण माफ होगा, उसमें भी बहुत परेशानियाँ आएँगी, लेकिन बड़े-बड़े पूँजीपतियों के लाखों-करोड़ों के ऋण माफ हो जाते हैं। ऐसा क्यों? उनका ऋण माफ करने की आवश्यकता क्या है?
दुःखी को देखकर दया करना, तो दया दुःखी से जुड़ी हुई है। धनी कोई दया का पात्र नहीं है। धनी सम्मान का पात्र है। अगर उसका धन उचित है, तो वह सम्मान का पात्र है, प्रशंसा का पात्र है। उससे ईर्ष्या नहीं होनी चाहिए।
आज देखें, संसार में सबसे अधिक दुःखी कौन है? किसान और मजदूर, ये दो मुझे सबसे अधिक दुःखी दिखाई देते हैं। जरा सोचें कि किसी कम्पनी का स्वामी कोई कर्मचारी रखता है, उसको कितना वेतन देता है? हर समय उसकी बुद्धि व्यापारिक वृद्धि में लगी होती है, इतनी कि मानवता नष्ट हो जाती है।
जब व्यापारिक बुद्धि बन जाती है, जब व्यापार-बुद्धि से हर कार्य होता है, तो मनुष्यता नष्ट हो जाती है। वह सोचता है कि कम से कम वेतन में अधिक से अधिक काम लिया जाए। यह भावना रहेगी तो वह गरीबों का शोषण करेगा, दया बिल्कुल नहीं आएगी।
जितना वह अपने मजदूरों को वेतन देता है, उससे अधिक धन तो उसके बच्चे एक दिन में ही व्यय कर देते होंगे, ऐसा मैं देखता हूँ।
मुझे गाँव में किसान के यहाँ पेड़ के नीचे खाट पर बैठकर थाली में सामान्य भोजन, रोटी-सब्जी खाना अधिक अच्छा लगता है, बजाय अरबपतियों के यहाँ अनेक प्रकार के व्यंजन खाने के। उसमें अनेक विचार आते हैं कि इसने यह धन कैसे कमाया होगा, लेकिन किसान और मजदूर के यहाँ बैठकर मुझे खाने में कोई ऐसा विचार नहीं आता। यही विचार आता है कि इसने परिश्रम करके हमें यह खिलाया है।
एक स्थान पर कोई कथा या यज्ञ का कार्यक्रम था। अंतिम दिन दक्षिणा देने के लिए जब सभी लोग आने लगे, कोई 500 दे रहा था, कोई 1000 दे रहा था। वहाँ एक बहुत वृद्ध महिला आई। उनको कोई दक्षिणा डालने नहीं देता था। यह देखकर वहाँ के एक साधु ने कहा, “माता जी को आगे आने दो।” जब वह दक्षिणा लाईं, तो अपनी साड़ी के एक कोने में पाँच रुपये का नोट बाँध लिया था, कहीं गिर न जाए। वह नोट भी फटा हुआ था। उस वृद्धा माता में उन साधु ने अपनी माता के दर्शन किए और उन्होंने कहा कि आपकी यह दक्षिणा 500 रुपये से अधिक है।
लेकिन आज का अपने आपको पढ़ा-लिखा बोलने वाला समाज उन्हें धुत्कारता है और जो धनपतियों की महिलाएँ थीं, वे उस माँ को नहीं चाहती थीं कि वह भी आकर दक्षिणा डाले। यह हम कैसा व्यवहार करते हैं?
जब मजदूर हड़ताल करते हैं, तब मालूम पड़ता है कि कारखाने के स्वामियों के लिए मजदूर की क्या कीमत है। उनके बच्चे भरपेट रोटी न खा सकें और हमारे बच्चे, अर्थात् धनपतियों के बच्चे, क्या-क्या खाते हैं, यह कहने की बात नहीं है। खाना ही सब कुछ नहीं है, वे बहुत-सी अन्य वस्तुओं पर भी व्यय करते हैं।
यह सब धर्म के विरुद्ध है। श्रीराम की पूजा करना, उनके नारे लगाना, मन्दिर बनवाना अलग बात है, लेकिन श्रीराम की भावना के अनुसार जीवन चलाना बहुत कठिन है।
श्रीराम ने भरत से कहा था, जब वे चित्रकूट में मिलने आए, “क्या तुम अपने सेवकों को बिना खिलाए स्वयं अकेले भोजन तो नहीं कर लेते हो?” इसका अर्थ सभी धनपतियों को समझना चाहिए। जो भी श्रीराम के भक्त हैं, उनको यह समझना चाहिए।
विश्व में क्या कहीं ऐसी व्यवस्था है कि किसी का मजदूर अच्छा भोजन कर सकता हो? क्या इतना वेतन कहीं मिलता है संसार में?
फिर बारी आती है किसानों की। एक किसान के परिवार को देखें, तो सारा परिवार खेती में लगा रहता है। बच्चे भी, पत्नी भी, पति भी, उनके पिता-माता भी, सब लगे रहते हैं। उनकी विवशता जोड़ें, तो क्या उनको कभी अपनी मजदूरी मिल पाती है?
चाहे कितनी भी फसल अच्छी हो, वर्तमान में जो अन्न का विक्रय-मूल्य है, जो समर्थन-मूल्य है, उससे उसकी मजदूरी कभी नहीं मिलती।
प्रधानमन्त्री एक योजना के अन्तर्गत डेढ़ गुना देते हैं किसानों को, यह बहुत अच्छी बात है, पर लागत का डेढ़ गुना। क्या लागत में उस परिवार की मजदूरी भी जोड़ी जाती है? एक व्यक्ति की मजदूरी 400 या 500 रुपये जोड़ लें, पत्नी की 300 रुपये जोड़ लें, उनके बच्चों की भी जोड़ लें, तो उन सबकी लगभग एक हजार रुपये प्रतिदिन की मजदूरी होगी।
जब तक फसल खेत में रहती है, तब तक सब लगे रहते हैं। क्या सरकार वह मजदूरी दे सकती है?
एक गरीब किसान के घर जाओ, छोटे किसान के घर जाओ और देखो कि वे क्या खाते हैं, क्या पहनते हैं, कितना काम करते हैं। बीमार होने पर वे अपनी चिकित्सा करा सकते हैं या नहीं करा सकते, वे बच्चों को पढ़ा सकते हैं या नहीं पढ़ा सकते हैं। यह सब देखेंगे, तब दया आनी चाहिए। तब नीतियाँ बननी चाहिए। तब दया-भाव होगा, अन्यथा दया-भाव नहीं होगा।
जितने भिक्षुक घूमते हैं, हम यह तो कहते हैं कि इन पर प्रतिबन्ध लगाओ, कोई भीख न माँगे। लेकिन क्या उनके लिए हमारे पास कोई दूसरी व्यवस्था है?
भिक्षुकों के प्रति दृष्टिकोण बदल गया है। कहते हैं कि उनको काम पर लगाओ। कोई सामान्य व्यक्ति जा रहा हो, वह किसी को कैसे काम पर लगा सकता है? उन्हें तो केवल सरकार या कोई पूँजीपति ही काम दे सकते हैं। हम कैसे काम दे सकते हैं? कहना सरल है, लेकिन काम देने की योजना तो सरकार ही बना सकती है।
अगर हमारे सामने कोई आए और कहे कि उसको खाना खिला देंगे, यह अच्छी बात है, लेकिन अगर कोई बीमार हो और बीमारी के लिए धन माँग रहा हो, तो केवल खाना खाकर क्या हो सकता है? हमें बहुत कुछ सोचना पड़ेगा। अगर वह गलत कर रहा है, तो वह अपने कर्मों का फल स्वयं भोगेगा। हमारा जो दया-गुण है, वह कहाँ काम आएगा?
कई लोग तो ऐसा धुत्कारते हैं जैसे कोई पशु आ गया हो। ऐसा धुत्कार मैंने देखा है। क्योंकि तुम गाड़ी में बैठे हो, क्योंकि तुम्हारे पास धन है, इसलिए धुत्कार रहे हो? गरीब है इसलिए न? वह दुःखी है इसलिए न? कहाँ गया आस्तिकता का गुण?
अगर हमारे पास कुछ देने के लिए नहीं है, या संयोगवश नहीं है, अथवा देना नहीं है, तो प्रेम से समझाकर मना भी कर सकते हो। लेकिन अपने लिए तो कहीं न कहीं से निकल आएगा, पर दूसरे के लिए नहीं है।
इसलिए यदि इस संसार के सभी लोग इस दया के गुण को अपना लें, तो संसार में शान्ति हो जाए।
दयावान व्यक्ति कोई ठग नहीं बन सकता, दयावान व्यक्ति कोई कसाई नहीं बन सकता, कोई मांसाहारी नहीं बन सकता, मछली खाने वाला नहीं बन सकता, अण्डे नहीं खा सकता। दयावान व्यक्ति किसी को लूट नहीं सकता और दयावान व्यक्ति किसी का शोषण भी नहीं कर सकता।
अगर कोई पूँजीपति है, तो वह यह देखे कि उसके यहाँ काम करने वाले कर्मचारियों का जीवन-स्तर क्या है और कैसा होना चाहिए। क्या उनकी सामान्य आवश्यकताएँ उस वेतन से पूरी हो रही हैं, जो वेतन उन्हें दिया जा रहा है? यह सोचना चाहिए, नहीं तो आपका पूजा-पाठ करना पाखण्ड ही है।
दया का भाव होगा, तो क्रोध का भाव समाप्त हो जाएगा। हिंसा समाप्त हो जाएगी, शारीरिक और मानसिक दोनों हिंसा, और पर्यावरण बहुत शुद्ध हो जाएगा। प्रेम और दया की तरंगें मिलकर सारे ब्रह्माण्ड को सन्तुलित कर सकती हैं।
दया का भाव हर समय कैसे आए?
दूसरों के साथ वह व्यवहार करो जो हमें अपने लिए प्रिय लगता हो। कभी कल्पना करो कि जैसे कोई भिक्षुक भीख माँग रहा है, या मेरे घर में कोई नौकर काम कर रहा है, या मेरी कम्पनी में कोई व्यक्ति नौकरी कर रहा है, या कोई वृद्धा हमारे यहाँ नौकरानी का काम कर रही है, तो हमारे मन में भाव आए कि मेरी माँ भी ऐसी नौकरानी होती और उससे उसका स्वामी ऐसा व्यवहार करता जैसा मैं इसके साथ कर रहा हूँ, तो मुझे कैसा लगता? उस वृद्धा नौकरानी में अपनी माँ को देखो, तो दया आएगी।
अगर माँ की तरह न देखो, लेकिन यह तो देखो कि वह भी परमपिता परमात्मा के परिवार की सदस्य है और मैं भी उसी का सदस्य हूँ। इससे हमारा सम्मान सबके प्रति समान होगा। किसी से भाई का सम्बन्ध होगा, किसी से बहन का होगा, किसी से माँ का होगा। इस प्रकार सम्बन्ध होंगे, तो निश्चित रूप से दया आएगी।
ईश्वर सब जगह होते हैं, सबमें होते हैं, तो क्या तुम्हें सबका ध्यान है? कितने लोग दुःखी हैं, कितने लोग गरीब हैं, कितने लोग भूखे हैं, क्या उनमें ब्रह्म नहीं है? आप कहते हैं कि ब्रह्म सबमें है, तो इनकी चिन्ता कौन करेगा? क्योंकि ब्रह्म उनके भीतर भी है। जब हम ब्रह्म को सबके भीतर देखेंगे, तो निश्चित रूप से दया-भाव आएगा। हम कहने के लिए कहते हैं कि ब्रह्म घट-घटवासी है, लेकिन वह व्यवहार में कभी नहीं आता।
अगर आग से हमारा हाथ जलता है, तो दुःख होता है, लेकिन किसी अन्य का जल जाए, तो प्रसन्न होते हैं कि जल गया है। अगर कोई मार्ग पर गिर जाए, तो हँसी आती है और अपने ठोकर लगे, तो रोते हैं। क्यों? क्योंकि हमने सबमें ब्रह्म को नहीं देखा, हमने सबमें समान जीवात्मा को नहीं देखा कि हमारे जैसा जीवात्मा उसमें भी है।
अगर हम सबमें ब्रह्म को देखेंगे, तब हम सबको अपना भाई समझेंगे, सबको अपने परिवार का सदस्य समझेंगे, जैसे परिवार के लोगों पर दया करते हैं। इसलिए सबमें ब्रह्म को मानें और सबको ब्रह्म में देखें, तो हमारा सम्बन्ध परिवार जैसा हो जाएगा। वास्तविक परिवार वह है जो सबमें ब्रह्म को देखे।
ईश्वर हमें शक्ति दे। ओम शांति!
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