भगवान शिव द्वारा धर्म का वर्णन उसके लक्षणों वर्णन और ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, ब्राह्मण और राज्य का धर्म विषय मे वर्णन | आर्यावर्त इतिहास संस्थान

आर्यावर्त इतिहास

भगवान शिव द्वारा धर्म का वर्णन उसके लक्षणों वर्णन और ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, ब्राह्मण और राज्य का धर्म विषय मे वर्णन | आर्यावर्त इतिहास संस्थान

महाभारत के अनुशासन पर्व मे जब भीष्म पितामह बाणों की शर-शय्या पर थे तब युधिस्थिर महाराज से भगवान शिव के और देवी उमा जी के संवाद को बतलाते है। 

हम भगवान शिव की पूजा करते है उनकी मूर्ति पर दूध पुष्प फल आदि अर्पण करते है लेकिन उनके अनुसार बताए हुए धर्म का अनुसरण नहीं करते तो मूर्ति की पूजा करने से कोई लाभ नहीं है।

भगवती उमा जी का भगवान शिव से धर्म के विषय मे पूछना

भगवन् सर्वभूतेश सर्वधर्मविदां वर । पिनाकपाणे वरद संशयो मे महानयम् ।। २० ।।

धर्मः किंलक्षणः प्रोक्तः कथं वा चरितुं नरैः । शक्यो धर्ममविन्दद्भिर्धर्मज्ञ वद मे प्रभो ।। २३ ।।

देवी पार्वती भगवान शिव से धर्म के विषय मे पूछते है की "हे भगवन्! हे समस्त प्राणियों के अधिपति! हे संपूर्ण धर्मों को जानने वाले मर्मज्ञों में सर्वश्रेष्ठ! हे हाथों में पिनाक धनुष धारण करने वाले वरदाता! मेरे मन में यह एक अत्यंत महान संशय उत्पन्न हुआ है। हे धर्मज्ञ! हे प्रभु! धर्म का क्या लक्षण बताया गया है? और धर्म को न जानने वाले मनुष्यों द्वारा इसका आचरण किस प्रकार किया जा सकता है, कृपया मुझे बताएँ।"

सामान्य एवं सनातन धर्म के लक्षण

अहिंसा सत्यवचनं सर्वभूतानुकम्पनम् । शमो दानं यथाशक्ति गार्हस्थ्यो धर्म उत्तमः ।। २५ ।।

परदारेष्वसंसर्गो न्यासस्त्रीपरिरक्षणम् । अदत्तादानविरमो मधुमांसस्य वर्जनम् ।। २६ ।।

भगवान शिव पार्वती जी से कहते है की "अहिंसा, सत्य बोलना, सभी प्राणियों के प्रति दयाभाव रखना, मन पर नियंत्रण रखना तथा अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान देना यही गृहस्थों का सबसे उत्तम धर्म है। पराई स्त्रियों से संपर्क न रखना, धरोहर के रूप में सौंपी गई स्त्री की रक्षा करना, बिना दी गई वस्तु को ग्रहण न करना अर्थात चोरी न करना, तथा मदिरा और मांस का त्याग करना चाहिए।"

वेदोक्तः परमो धर्मः स्मृतिशास्त्रगतोऽपरः । शिष्टाचीर्णोऽपरः प्रोक्तस्त्रयो धर्माः सनातनाः ।। ६५ ।।

त्रैविद्यो ब्राह्मणो विद्वान् न चाध्ययनजीवकः । त्रिकर्मा त्रिपरिक्रान्तो मैत्र एष स्मृतो द्विजः ।। ६६ ।।

"वेदों में वर्णित धर्म सबसे उत्कृष्ट परम धर्म है। दूसरा स्मृति-शास्त्रों में वर्णित धर्म है, और तीसरा श्रेष्ठ सज्जन पुरुषों द्वारा आचरित धर्म कहा गया है। ये तीनों ही सनातन धर्म हैं। जो तीनों वेदों का ज्ञाता और विद्वान् हो, किन्तु केवल विद्या पढ़ाने से ही अपनी जीविका न चलाता हो, जो तीन कर्मों यज्ञ, दान, धर्म का नित्य अनुष्ठान करने वाला हो, तीन दोषों काम, क्रोध, लोभ से मुक्त हो चुका हो तथा सभी प्राणियों के प्रति मैत्रीभाव रखता हो, वास्तव में ऐसा पुरुष ही श्रेष्ठ द्विज ब्राह्मण माना गया है।"

सर्वभूतानुकम्पी यः सर्वभूतार्जवव्रतः । सर्वभूतात्मभूतश्च स वै धर्मेण युज्यते ।। २८ ।।

सर्ववेदेषु वा स्नानं सर्वभूतेषु चार्जवम् । उभे एते समे स्यातामार्जवं वा विशिष्यते ।। २९ ।।

आर्जवं धर्ममित्याहुरधर्मो जिह्म उच्यते । आर्जवेनेह संयुक्तो नरो धर्मेण युज्यते ।। ३० ।।

आर्जवे तु रतो नित्यं वसत्यमरसंनिधौ । तस्मादार्जवयुक्तः स्याद् य इच्छेद् धर्ममात्मनः ।। ३१ ।।

"जो मनुष्य सम्पूर्ण प्राणियों पर दया अनुकम्पा करता है, सबके साथ अत्यंत सरलता का व्यवहार करता है, और सभी प्राणियों को अपनी ही आत्मा के समान मानता है, वह निश्चय ही परम धर्म से युक्त होता है। चारों वेदों के ज्ञान में निष्णात होना और समस्त प्राणियों के प्रति सरलता निष्कपटता का भाव रखना ये दोनों ही एक समान समझे जाते हैं, अथवा इनमें सरलता का ही महत्त्व अधिक विशिष्ट माना गया है।

विद्वान जन सरलता को ही धर्म कहते हैं और कुटिलता छल-कपट को अधर्म कहा जाता है। इस लोक में जो मनुष्य सरलता के भाव से युक्त रहता है, वही वास्तव में धर्म के फल का भागी होता है। जो व्यक्ति सदा सरल बर्ताव सरलता में तत्पर रहता है, वह देवताओं के समीप निवास करता है। इसलिए जो मनुष्य अपने लिए धर्म का फल प्राप्त करना चाहता हो, उसे सदा सरलता से युक्त रहना चाहिए।"

क्षान्तो दान्तो जितक्रोधो धर्मभूतो विहिंसकः । धर्मे रतमना नित्यं नरो धर्मेण युज्यते ।। ३२ ।।

व्यपेततन्द्रिर्धर्मात्मा शक्त्या सत्पथमाश्रितः । चारित्रपरमो बुद्धो ब्रह्मभूयाय कल्पते ।। ३३ ।।

उपवासव्रतैर्दान्ता ह्यहिंसाः सत्यवादिनः । संसिद्धाः प्रेत्य गन्धर्वैः सह मोदन्त्यनामयाः ।। ३८ ।।

"जो मनुष्य क्षमाशील है, जितेन्द्रिय है, जिसने अपने क्रोध को जीत लिया है, जो धर्मनिष्ठ और पूर्णतः अहिंसक है, तथा जिसका मन सदा धर्म में लगा रहता है, वही मनुष्य सच्चे धर्म के फल का भागी होता है। जिसका आलस्य पूर्णतः दूर हो गया है, ऐसा जो धर्मात्मा अपनी सामर्थ्य के अनुसार सन्मार्ग का आश्रय लेता है, और सदाचार ही जिसका परम लक्ष्य है, वह ज्ञानी प्रबुद्ध पुरुष ब्रह्मभाव मोक्ष को प्राप्त करने के योग्य हो जाता है।

श्रीमहेश्वर ने कहा जो पुरुष उपवास आदि व्रतों का पालन करके जितेन्द्रिय इन्द्रियों को वश में करने वाले हो गए हैं, जो सर्वथा हिंसारहित और सत्य बोलने वाले हैं, ऐसे सिद्धि प्राप्त कर चुके मुनि मृत्यु के पश्चात रोग और शोक से पूर्णतः मुक्त होकर गन्धर्वों के साथ आनंद का उपभोग करते हैं।"

न स्तम्भी न च मानी स्यान्नाप्रसन्नो न विस्मितः । मित्रामित्रसमो मैत्रो यः स धर्मविदुत्तमः ।। ११५ ।।

"जो पुरुष न तो घमंडी हो, न अभिमानी हो, न कभी अप्रसन्न दुखी होता हो, और न ही अपनी किसी सिद्धि पर अहंकारयुक्त विस्मित होता हो। जो मित्र और शत्रु दोनों के प्रति समान भाव रखता हो तथा सभी प्राणियों का सच्चा हितैषी हो, वही व्यक्ति धर्म को जानने वालों में सर्वश्रेष्ठ माना गया है।"

ब्रह्मचर्य आश्रम का धर्म

रहस्यश्रवणं धर्मो वेदव्रतनिषेवणम् । अग्निकार्यं तथा धर्मो गुरुकार्यप्रसाधनम् ।। ३५ ।।

भैक्षचर्या परो धर्मो नित्ययज्ञोपवीतिता । नित्यं स्वाध्यायिता धर्मो ब्रह्मचर्याश्रमस्तथा ।। ३६ ।।

गुरुणा चाभ्यनुज्ञातः समावर्तेत वै द्विजः । विन्देतानन्तरं भार्यामनुरूपां यथाविधि ।। ३७ ।।

भगवान शिव पहले ब्रह्मचर्य आश्रम के बारे मे बतलाते है "धर्म के रहस्यों को सुनना, वेदोक्त व्रतों का पालन करना, अग्निहोत्र हवन करना तथा गुरु के कार्यों को सिद्ध करना गुरु सेवा करना यह ब्रह्मचर्य आश्रम का धर्म है। भिक्षाटन भिक्षा मांगकर लाना परम धर्म है। नित्य यज्ञोपवीत जनेऊ धारण किए रहना, प्रतिदिन वेदों का स्वाध्याय करना तथा ब्रह्मचर्य आश्रम के नियमों का पालन करना भी प्रधान धर्म है।

ब्रह्मचर्य की अवधि समाप्त होने पर द्विज अपने गुरु की आज्ञा प्राप्त करके समावर्तन घर वापसी करे। उसके बाद वह विधिपूर्वक अपने योग्य अनुरूप स्त्री से विवाह करे।"

गृहस्थ आश्रम का धर्म

आहिताग्निरधीयानो जुह्वानः संयतेन्द्रियः । विघसाशी यताहारो गृहस्थः सत्यवाक् शुचिः ।। ३९ ।।

अतिथिव्रतता धर्मो धर्मस्त्रेताग्निधारणम् । इष्टीश्च पशुबन्धांश्च विधिपूर्वं समाचरेत् ।। ४० ।।

यज्ञश्च परमो धर्मस्तथाहिंसा च देहिषु । अपूर्वभोजनं धर्मो विघसाशित्वमेव च ।। ४१ ।।

भुक्ते परिजने पश्चाद् भोजनं धर्म उच्यते । ब्राह्मणस्य गृहस्थस्य श्रोत्रियस्य विशेषतः ।। ४२ ।।

भगवान शिव ग्रहस्थ धर्म के बारे मे बतलाते है की "गृहस्थ को अग्निस्थापनपूर्वक अग्निहोत्र करने वाला, स्वाध्यायशील, हवन करने वाला, जितेन्द्रिय, विघसाशी अर्थात परिजनों के बाद बचा हुआ अन्न खाने वाला, मिताहारी, सत्यवादी और पवित्र होना चाहिए। अतिथि-सत्कार करना और गार्हपत्य आदि तीन प्रकार की अग्नियों को धारण करना गृहस्थ का धर्म है। उसे नाना प्रकार की इष्टियों यज्ञों और पशुबंध पशुरक्षाकर्म का भी विधिपूर्वक आचरण करना चाहिए। यज्ञ करना तथा देहधारियों अर्थात सभी जीवों के प्रति अहिंसा का पालन करना परम धर्म है।

अपूर्व भोजन न करना अर्थात दूसरों से पहले न खाना तथा विघसाशी होना कुटुम्ब के लोगों के भोजन कर लेने पर बचे हुए अन्न का भोजन करना भी उसका धर्म है। परिजनों कुटुम्ब के लोगों के भोजन कर लेने के पश्चात् ही भोजन करना धर्म कहा जाता है, विशेष रूप से श्रोत्रिय वेदपाठी ब्राह्मण गृहस्थ के लिए यह परम आवश्यक है।"

दम्पत्योः समशीलत्वं धर्मः स्याद् गृहमेधिनः । गृह्याणां चैव देवानां नित्यपुष्पबलिक्रिया ।। ४३ ।।

नित्योपलेपनं धर्मस्तथा नित्योपवासिता । सुसम्मृष्टोपलिप्ते च साज्यधूमो भवेद् गृहे ।। ४४ ।।

एष द्विजजने धर्मो गार्हस्थ्यो लोकधारणः । द्विजानां च सतां नित्यं सदैवैष प्रवर्तते ।। ४५ ।।

भगवान शिव ग्रहस्थ धर्म के बारे मे और बतलाते है की "पति और पत्नी दोनों का स्वभाव आचरण एक-समान एक-दूसरे के अनुकूल होना चाहिए। घर के देवताओं की प्रतिदिन पुष्पों द्वारा पूजा करना, उन्हें अन्न की बलि नैवेद्य समर्पित करना, प्रतिदिन घर को लीपना पवित्र करना तथा नित्य उपवास संयम रखना यह गृहस्थ का धर्म है। ब्राह्मणों द्विजों का यह गार्हस्थ्य धर्म संसार को धारण करने पोषण करने वाला बताया गया है। श्रेष्ठ सज्जन द्विजों के यहाँ सदा ही नित्य इस धर्म का पालन किया जाता है।"

प्रवृत्तिलक्षणो धर्मो गृहस्थेषु विधीयते । तमहं वर्तयिष्यामि सर्वभूतहितं शुभम् ।। ७६ ।।

दातव्यमसकृच्छक्त्या यष्टव्यमसकृत् तथा । पुष्टिकर्मविधानं च कर्तव्यं भूतिमिच्छता ।। ७७ ।।

धर्मेणार्थः समाहार्यो धर्मलब्धं त्रिधा धनम् । कर्तव्यं धर्मपरमं मानवेन प्रयत्नतः ।। ७८ ।।

एकेनांशेन धर्मार्थौ कर्तव्यौ भूतिमिच्छता । एकेनांशेन कामार्थ एकमंशं विवर्धयेत् ।। ७९ ।।

"गृहस्थ आश्रम में रहने वाले मनुष्यों के लिए प्रवृत्तिरूप निरंतर सत्कर्मों में लगे रहने वाले धर्म का विधान किया गया है। अब मैं उसी शुभ और समस्त प्राणियों के लिए अत्यंत कल्याणकारी धर्म का वर्णन करूँगा। ऐश्वर्य और समृद्धि की कामना रखने वाले गृहस्थ मनुष्य को अपनी सामर्थ्य के अनुसार निरंतर दान देना चाहिए, बारंबार यज्ञ हवन आदि करना चाहिए तथा पुष्टि बल एवं समृद्धि प्रदान करने वाले मंगलकारी कर्मों का अनुष्ठान भी अवश्य करना चाहिए। मनुष्य को धर्म न्याय के मार्ग पर चलकर ही धन का उपार्जन करना चाहिए। 

तदनंतर, उस धर्मपूर्वक अर्जित किए गए धन को तीन भागों में विभक्त कर देना चाहिए। मनुष्य को अत्यंत प्रयत्नपूर्वक सदैव धर्म को ही सर्वोपरि मानकर श्रेष्ठ कर्मों का अनुष्ठान करना चाहिए। अपनी उन्नति और ऐश्वर्य की कामना रखने वाले पुरुष को चाहिए कि वह धन के उन तीन भागों में से एक भाग से धर्म और अर्थ से संबंधित कार्यों की सिद्धि करे। दूसरे भाग का उपयोग अपनी उचित इच्छाओं की पूर्ति व उपभोग के लिए करे तथा तीसरे भाग को भविष्य के लिए संचित करके बढ़ाए।"

ये च दम्पतिधर्माणः स्वदारनियतेन्द्रियाः । चरन्ति विधिवद् दृष्टं तदनुकालाभिगामिनः ।। २५ ।।

तेषामृषिकृतो धर्मो धर्मिणामुपपद्यते । न कामकारात् कामोऽन्यः संसेव्यो धर्मदर्शिभिः ।। २६ ।।

सर्वभूतेषु यः सम्यग् ददात्यभयदक्षिणाम् । हिंसादोषविमुक्तात्मा स वै धर्मेण युज्यते ।। २७ ।।

"और जो गृहस्थ दाम्पत्य धर्म का पालन करते हुए, केवल अपनी पत्नी तक ही अपनी इन्द्रियों को संयमित रखते हैं, तथा शास्त्रोक्त विधि के अनुसार केवल ऋतुकाल में ही अपनी पत्नी के साथ समागम करते हुए वेदविहित धर्म का आचरण करते हैं। उन धर्मात्माओं को ऋषियों द्वारा बताया गया धर्म पुण्यफल ही प्राप्त होता है।

धर्म के तत्त्व को जानने वाले धर्मदर्शी पुरुषों को कामनावश होकर स्वेच्छा से किसी अन्य काम-भोग का सेवन कदापि नहीं करना चाहिए। जो मनुष्य हिंसा के दोष से पूर्णतः मुक्त अंतःकरण वाला होकर सम्पूर्ण प्राणियों को सम्यक् रूप से अभयदान किसी को भी भयभीत न करने का दान देता है, वह निश्चय ही परम धर्म से युक्त होता है।"

राजा एवं क्षत्रिय का धर्म

यस्तु क्षत्रगतो देवि मया धर्म उदीरितः । तमहं ते प्रवक्ष्यामि तन्मे शृणु समाहिता ।। ४६ ।।

क्षत्रियस्य स्मृतो धर्मः प्रजापालनमादितः । निर्दिष्टफलभोक्ता हि राजा धर्मेण युज्यते ।। ४७ ।।

प्रजाः पालयते यो हि धर्मेण मनुजाधिपः । तस्य धर्मार्जिता लोकाः प्रजापालनसंचिताः ।। ४८ ।।

तस्य राज्ञः परो धर्मो दमः स्वाध्याय एव च । अग्निहोत्रपरिस्पन्दो दानाध्ययनमेव च ।। ४९ ।।

फिर भगवान शिव राजा के धर्म के बारे मे भगवती से कहते है की "हे देवी! मेरे द्वारा क्षत्रियों के जिस धर्म का वर्णन किया गया है, उसे मैं अब तुमसे कहूँगा, तुम एकाग्रचित्त ध्यानपूर्वक होकर मुझसे वह सुनो। क्षत्रियों का सबसे पहला मुख् धर्म प्रजा का पालन रक्षा करना माना गया है। शास्त्रों द्वारा निर्धारित कर राजस्व का उपभोग करने वाला राजा निश्चय ही धर्म से युक्त होता है।

जो राजा धर्मपूर्वक प्रजा का पालन करता है, उसे प्रजापालन के प्रभाव से धर्म द्वारा अर्जित किए गए उत्तम लोक प्राप्त होते हैं। उस राजा का परम धर्म इन्द्रियों को वश में रखना और स्वाध्याय करना है। अग्निहोत्र का अनुष्ठान करना तथा दान एवं अध्ययन करना भी उसका परम धर्म है।"

यज्ञोपवीतधारणं यज्ञो धर्मक्रियास्तथा । भृत्यानां भरणं धर्मः कृते कर्मण्यमोघता ।। ५० ।।

सम्यग्दण्डे स्थितिर्धर्मो धर्मो वेदक्रतुक्रियाः । व्यवहारस्थितिर्धर्मः सत्यवाक्यरतिस्तथा ।। ५१ ।।

"यज्ञोपवीत धारण करना, यज्ञ करना तथा अन्य धार्मिक कार्य करना राजा का धर्म है। सेवकों आश्रितों का भरण-पोषण करना और किए गए कार्यों को सफल बनाना निष्फल न होने देना भी उसका धर्म है। उचित दण्ड-व्यवस्था कायम रखना धर्म है, वेदों में बताए गए यज्ञ आदि करना धर्म है। न्याय के निर्णय की मर्यादा बनाए रखना तथा सत्य वचनों में प्रीति लगाव रखना भी राजा का धर्म है।"

आर्तहस्तप्रदो राजा प्रेत्य चेह महीयते । गोब्राह्मणार्थे विक्रान्तः संग्रामे निधनं गतः ।। ५२ ।। अश्वमेधजिताँल्लोकानाप्नोति त्रिदिवालये ।। ५३ ।।

"दुखियों संकटग्रस्तों को सहारा देने वाला राजा इस लोक और परलोक दोनों में सम्मान महिमा प्राप्त करता है। गायों और ब्राह्मणों की रक्षा के लिए पराक्रम दिखाता हुआ जो राजा युद्ध में वीरगति मृत्यु को प्राप्त होता है, वह राजा स्वर्गलोक में उन उत्तम लोकों को प्राप्त करता है, जो अश्वमेध यज्ञ करने वालों को प्राप्त होते हैं अर्थात उसे अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य प्राप्त होता है।"

ब्राह्मण का विशेष धर्म एवं षट्कर्म

षडिमानि तु कर्माणि प्रोवाच भुवनेश्वरः । वृत्त्यर्थं ब्राह्मणानां वै शृणु धर्मान् सनातनान् ।। ६७ ।।

यजनं याजनं चैव तथा दानप्रतिग्रहौ । अध्यापनं चाध्ययनं षट्कर्मा धर्मभाग् द्विजः ।। ६८ ।।

नित्यः स्वाध्यायिता धर्मो धर्मो यज्ञः सनातनः । दानं प्रशस्यते चास्य यथाशक्ति यथाविधि ।। ६९ ।।

शमस्तूपरमो धर्मः प्रवृत्तः सत्सु नित्यशः । गृहस्थानां विशुद्धानां धर्मस्य निचयो महान् ।। ७० ।।

"सम्पूर्ण भुवनों के स्वामी ब्रह्मा जी ने ब्राह्मणों की जीविका के लिए इन छः कर्मों का विधान बताया है। ब्राह्मणों के लिए जो सनातन धर्म निश्चित किये गए हैं, उनके नाम सुनो। यज्ञ करना और यज्ञ कराना, दान देना तथा दान ग्रहण करना, वेद पढ़ाना और वेद पढ़ना—इन छः कर्मों को करने वाला द्विज ब्राह्मण ही यथार्थ धर्म का भागी होता है। प्रतिदिन शास्त्रों का स्वाध्याय अध्ययन करना मुख्य धर्म है तथा यज्ञ करना सनातन धर्म है।

इसके अतिरिक्त, अपनी सामर्थ्य और शास्त्रोक्त विधि के अनुसार दान देना अत्यंत प्रशंसनीय और श्रेष्ठ माना गया है। सांसारिक विषयों से विरक्त होकर इन्द्रियों को वश में रखना शम परम धर्म कहलाता है, जो सज्जन पुरुषों के आचरण में सदा विद्यमान रहता है। इस धर्म का पालन करने से पवित्र अंतःकरण वाले गृहस्थों को महान धर्म पुण्य का संचय प्राप्त होता है।"

शूद्र का धर्म

सर्वातिथ्यं त्रिवर्गस्य यथाशक्ति निशानिशम् । शूद्रधर्मः समाख्यातस्त्रिवर्गपरिचारणम् ।। ७५ ।।

"अपनी सामर्थ्य के अनुसार रात-दिन निरंतर ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य—इन तीनों वर्णों का अतिथि सत्कार करना तथा इन तीनों वर्णों की निष्काम भाव से सेवा करना ही शूद्र का प्रधान धर्म बताया गया है।"

अतिथि सत्कार एवं धार्मिक पुरुष के लक्षण

पञ्चयज्ञविशुद्धात्मा सत्यवागनसूयकः । दाता ब्राह्मणसत्कर्ता सुसंसृष्टनिवेशनः ।। ७१ ।।

अमानी च सदाजिह्मः स्निग्धवाणीप्रदस्तथा । अतिथ्यभ्यागतरतिः शेषान्नकृतभोजनः ।। ७२ ।।

पाद्यमर्घ्यं यथान्यायमासनं शयनं तथा । दीपं प्रतिश्रयं चैव यो ददाति स धार्मिकः ।। ७३ ।।

फिर भगवान शिव कहते है की "जो व्यक्ति पंचमहायज्ञों के अनुष्ठान से पवित्र अंतःकरण वाला है, सदैव सत्य बोलने वाला है, दूसरों की निंदा या ईर्ष्या न करने वाला है, दान देने वाला है, ब्राह्मणों का आदर-सत्कार करने वाला है और जिसका घर अत्यंत स्वच्छ रहता है। यह गुण श्लोक ७३ के साथ जुड़ते हैं। 

तथा जो व्यक्ति अहंकार से सर्वथा मुक्त है, हमेशा छल-कपट से दूर सरल स्वभाव का है, मधुर और प्रेमपूर्ण वाणी बोलने वाला है, घर आए हुए अतिथियों और अभ्यागतों की सेवा में आनंदपूर्वक तत्पर रहने वाला है, और सबके भोजन कर लेने के पश्चात् बचे हुए अन्न को ही ग्रहण करने वाला है।

तथा जो व्यक्ति श्लोक ७१ और ७२ में बताए गए गुणों से युक्त होकर अपने घर आए अतिथियों को यथोचित रीति से चरण धोने के लिए जल पाद्य, पूजा का जल अर्घ्य, बैठने के लिए आसन, विश्राम के लिए शय्या, प्रकाश के लिए दीपक और ठहरने के लिए आश्रय प्रदान करता है, वही वास्तव में सच्चा धार्मिक है।"

प्रातरुत्थाय चाचम्य भोजनेनोपमन्त्र्य च । सत्कृत्यानुव्रजेद् यस्तु तस्य धर्मः सनातनः ।। ७४ ।।

"जो व्यक्ति प्रातःकाल उठकर, आचमन शुद्धि करके, ब्राह्मणों अथवा अतिथियों को भोजन के लिए आमंत्रित करता है और सत्कारपूर्वक भोजन कराने के पश्चात विदा करते समय कुछ दूर तक उनके पीछे-पीछे जाता है, उसके द्वारा ही सनातन धर्म का वास्तविक रूप से पालन होता है।"

संन्यास एवं निवृत्ति (मोक्ष) धर्म

निवृत्तिलक्षणस्त्वन्यो धर्मो मोक्षाय तिष्ठति । तस्य वृत्तिं प्रवक्ष्यामि शृणु मे देवि तत्त्वतः ।। ८० ।।

सर्वभूतदया धर्मो न चैकग्रामवासिता । आशापाशविमोक्षश्च शस्यते मोक्षकाङ्क्षिणाम् ।। ८१ ।।

न कुट्यां नोदके सङ्गो न वाससि न चासने । न त्रिदण्डे न शयने नाग्नौ न शरणालये ।। ८२ ।।

श्री भगवान कहते हैं - "हे देवी! इस प्रवृत्ति धर्म से भिन्न एक दूसरा 'निवृत्तिरूप' वैराग्यप्रधान धर्म भी है, जो मोक्ष प्राप्ति का मुख्य साधन है। अब मैं उस निवृत्ति धर्म के वास्तविक स्वरूप का यथार्थ वर्णन करूँगा, तुम उसे मुझसे ध्यानपूर्वक सुनो।

समस्त प्राणियों के प्रति दया करुणा का भाव रखना, किसी एक ही गाँव या स्थान पर स्थायी रूप से निवास न करना निरंतर भ्रमणशील रहना, तथा आशा तृष्णा रूपी बंधनों से स्वयं को पूर्णतः मुक्त कर लेना मोक्ष की कामना रखने वाले संन्यासियों के लिए यही श्रेष्ठ धर्म और अत्यंत प्रशंसनीय आचरण बताया गया है। मोक्ष की अभिलाषा रखने वाले पुरुष को न तो कुटिया झोपड़ी में, न जल में, न वस्त्र में, न ही आसन में आसक्ति लगाव रखनी चाहिए। इसी प्रकार न त्रिदण्ड में, न शय्या बिस्तर में, न अग्नि में और न ही किसी निवास स्थान आश्रय में अनुराग मोह रखना चाहिए।"

मुनि, ऋषि एवं उञ्छवृत्ति धर्म के नियम

ये त्वन्ये शुद्धमनसो दयाधर्मपरायणाः ।सन्तश्चक्रचराः पुण्याः सोमलोकचराश्च ये ।। १०३ ।।

पितृलोकसमीपस्थास्त उञ्छन्ति यथाविधि । सम्प्रक्षालाश्मकुट्टाश्च दन्तोलूखलिकाश्च ते ।। १०४ ।।

सोमपानां च देवानामुष्मपाणां तथैव च । उञ्छन्ति ये समीपस्थाः सदारा नियतेन्द्रियाः ।। १०५ ।।

"इनके अतिरिक्त दूसरे भी बहुत-से शुद्ध पवित्र चित्त वाले, दया और धर्म में निरंतर तत्पर रहने वाले पुण्यात्मा सज्जन हैं, जिनमें कुछ चक्रचर चक्र के समान निरंतर विचरने वाले, कुछ सोमलोक चन्द्रलोक में विचरने वाले और कुछ पितृलोक के निकट निवास करने वाले हैं। ये सभी सज्जन शास्त्रोक्त विधि के अनुसार उञ्छवृत्ति गिरे हुए अन्न को चुनकर से ही अपनी जीविका चलाते हैं। उन ऋषियों में कोई सम्प्रक्षाल अन्न का संचय न करके बर्तन धोकर रख देने वाले, कोई अश्मकुट्ट पत्थरों से अन्न कूटकर खाने वाले और कोई दन्तोलूखलिक दांतों से ही चबाकर कच्चा अन्न खाने वाले हैं।

जो सोमप चंद्रमा की किरणों का पान करने वाले और उष्णप सूर्य की किरणों का पान करने वाले देवताओं के निकट रहकर, अपनी इन्द्रियों को पूर्णतः वश में रखते हुए सस्त्रीक अपनी पत्नी सहित उञ्छवृत्ति से ही अपना जीवन निर्वाह करते हैं।"

तेषामग्निपरिस्पन्दः पितॄणां चार्चनं तथा । यज्ञानां चैव पञ्चानां यजनं धर्म उच्यते ।। १६ ।।

ससर्वेष्वेवर्षिधर्मेषु ज्ञेयोऽऽत्मा संयतेन्द्रियैः । कामक्रोधौ ततः पश्चाज्जेतव्याविति मे मतिः ।। १०८ ।।

"नित्य अग्निहोत्र हवन का अनुष्ठान करना, पितरों का यथोचित पूजन श्राद्ध करना तथा पांचों महायज्ञों पंचमहायज्ञों का विधिपूर्वक अनुष्ठान करना ही उनका मुख्य धर्म कहा जाता है। संयमित इन्द्रियों वाले मुनियों द्वारा सभी प्रकार के ऋषिधर्मों में सबसे पहले अपनी 'आत्मा' को ही भली-भांति जानने योग्य सर्वोपरि समझना चाहिए। उसके पश्चात काम और क्रोध पर पूर्ण रूप से विजय प्राप्त करनी चाहिए, ऐसा मेरा स्पष्ट मत विचार है।"

निवृत्तिरुपभोगेषु गोरसानां शमे रतिः । स्थण्डिले शयने योगः शाकपर्णनिषेवणम् ।। १११ ।।

फलमूलाशनं वायुरापः शैवलभक्षणम् । ऋषीणां नियमा ह्येते यैर्जयन्त्यजितां गतिम् ।। ११२ ।।

"समस्त प्रकार के सांसारिक विषय-भोगों से सर्वथा दूर निवृत्त रहना, आहार में केवल गोरस दूध आदि ग्रहण करना, इन्द्रिय निग्रह और शांति शम में निष्ठा रखना, पवित्र भूमि या चबूतरे पर शयन करना, निरंतर योगाभ्यास करना, साग-पात का सेवन करना, कंद-मूल-फल खाना तथा केवल वायु, जल या सेवार काई का आहार करके रहना—ये सब ऋषियों के कठोर नियम हैं। निश्चय ही इन नियमों का भली-भांति पालन करने से वे मुनिगण उस सर्वश्रेष्ठ और अजित गति परम पद को प्राप्त कर लेते हैं।"

विधूमे सन्नमुसले व्यङ्गारे भुक्तवज्जने । अतीतपात्रसंचारे काले विगतभिक्षुके ।। ११३ ।।

अतिथिं काङ्क्षमाणो वै शेषान्नकृतभोजनः । सत्यधर्मरतः शान्तो मुनिधर्मेण युज्यते ।। ११४ ।।

"जब घर से धुआँ निकलना बंद हो जाए, मूसल का चलना कूटने का काम शांत हो जाए, चूल्हे के अंगारे बुझ जाएँ, घर के सभी लोग भोजन कर चुके हों, बर्तनों का खटकना बंद हो जाए तथा सभी भिक्षुक भी भिक्षा लेकर चले जाएँ, उस समय जो व्यक्ति अतिथि के आने की प्रतीक्षा करता है और सबको भोजन कराने के पश्चात बचे हुए शेष अन्न को ही भोजन के रूप में ग्रहण करता है। सत्य और धर्म में निरंतर तत्पर रहने वाला वह शांत स्वभाव का पुरुष ही वास्तविक मुनिधर्म से युक्त माना जाता है।"

वानप्रस्थ आश्रम का धर्म एवं तपस्या

त्रिकालमभिषेकं च पितृदेवार्चनं तथा । अग्निहोत्रपरिस्पन्द इष्टिहोमविधिस्तथा ।। ६ ।।

योगचर्याकृतैः सिद्धैः कामक्रोधविवर्जितैः । वीरशय्यामुपासद्भिर्वीरस्थानोपसेविभिः ।। ८ ।।

"वानप्रस्थियों को दिन में तीन बार प्रातः, दोपहर और सायं स्नान करना चाहिए तथा पितरों और देवताओं का भली-भांति पूजन करना चाहिए। इसके साथ ही निरंतर अग्निहोत्र हवन का अनुष्ठान तथा इष्टि नामक यज्ञ का विधानपूर्वक पालन करना चाहिए।

उन्हें निरंतर योगाभ्यास करते हुए उसमें सिद्धि प्राप्त करनी चाहिए और काम वासना तथा क्रोध का पूर्णतः त्याग कर देना चाहिए। उन्हें वीरासन लगाकर वीर शय्या का आश्रय लेकर बैठना चाहिए और वीरस्थान विशाल एवं एकांत स्थान का ही सेवन निवास करना चाहिए।"

युक्तैर्योगवहैः सद्भिर्ग्रीष्मे पञ्चतपैस्तथा । मण्डूकयोगनियतैर्यथान्यायं निषेविभिः ।। ९ ।।

तेषां होमक्रिया धर्मः पञ्चयज्ञनिषेवणम् । भागं च पञ्चयज्ञस्य वेदोक्तस्यानुपालनम् ।। १४ ।।

"उन सत्पुरुषों को मन एकाग्र करके निरंतर योगसाधन में तत्पर रहना चाहिए। ग्रीष्म गर्मी ऋतु में पंचाग्नि का सेवन चारों ओर अग्नि जलाकर और ऊपर सूर्य के ताप को सहना करना चाहिए। हठयोग में प्रसिद्ध 'मंडूक योग' के नियमों में स्थित रहकर सभी वस्तुओं का शास्त्रोक्त विधि न्यायानुकूल से ही सेवन करना चाहिए।

प्रतिदिन अग्निहोत्र हवन करना और पंचमहायज्ञों का अनुष्ठान करना उन वानप्रस्थियों का मुख्य धर्म है। उन्हें वेदों में बताए गए पंचमहायज्ञों के अंश का निरंतर विधिपूर्वक पालन करना चाहिए।"

विमुक्ता दारसंयोगैर्विमुक्ताः सर्वसंकरैः । विमुक्ताः सर्वपापैश्च चरन्ति मुनयो वने ।। १६ ।।

त्रिकालमभिषेकश्च होत्रं त्वृषिकृतं महत् । समाधिसत्पथस्थानं यथोद्दिष्टनिषेवणम् ।। २३ ।।

"वानप्रस्थ मुनि स्त्री-समागम पत्नी के संपर्क से सर्वथा मुक्त होकर, सब प्रकार के संकरों दोषों से दूर रहकर तथा संपूर्ण पापों से पूर्णतः मुक्त होकर निरंतर वन में ही विचरण करते रहते हैं।

प्रतिदिन तीन बार तीनों कालों में स्नान करना, ऋषियों द्वारा आचरित महान् अग्निहोत्र हवन करना, समाधि तथा सन्मार्ग पर स्थित रहना और उपदेश शास्त्रों के अनुसार नियमों का भली-भांति पालन करना ही उनका धर्म है।"

मण्डूकयोगशयनो यथान्यायं यथाविधि । दीक्षां चरति धर्मात्मा स नागैः सह मोदते ।। ३९ ।।

"जो धर्मात्मा पुरुष न्याय के अनुकूल और शास्त्रोक्त विधि के अनुसार हठयोग में प्रसिद्ध मण्डूक-योग के माध्यम से शयन करता है और यज्ञ आदि की दीक्षा ग्रहण करके तदनुसार आचरण करता है, वह परलोक में नागलोक जाकर नागों के साथ आनंद का उपभोग करता है।"

आहारनियमं कृत्वा मुनिर्द्वादशवार्षिकम् । मरुं संसाध्य यत्नेन राजा भवति पार्थिवः ।। ४४ ।।

स्थण्डिलस्य फलान्याहुर्यानानि शयनानि च ।। ४६ ।। गृहाणि च महार्हाणि चन्द्रशुभ्राणि भामिनि ।

आत्मानमुपजीवन् यो नियतो नियताशनः ।। ४७ ।। देहं वानशने त्यक्त्वा स स्वर्गं समुपाश्नुते ।

"जो मुनि बारह वर्षों तक अपने आहार का पूर्ण संयम नियमन करता हुआ यत्नपूर्वक मरु निर्जल व्रत अर्थात् जल का भी त्याग करके की कठोर साधना करता है, वह इस पृथ्वी का महान राजा होता है। हे भामिनि पार्वती! पवित्र वेदी भूमि पर शयन करने के फलस्वरूप प्राप्त होने वाले फल इस प्रकार बताए गए हैं उस मुनि को श्रेष्ठ विमान वाहन, उत्तम शय्याएँ और चंद्रमा के समान अत्यंत उज्ज्वल एवं बहुमूल्य भवन प्राप्त होते हैं।

जो वानप्रस्थी केवल अपने ही सहारे स्वावलंबी होकर जीवन-यापन करता है, नियमों में दृढ़तापूर्वक स्थित रहकर संयमित भोजन करता है, अथवा अनशन व्रत का आश्रय लेकर अपने शरीर का त्याग कर देता है, वह स्वर्ग के सुख को भली-भांति प्राप्त करता है।"

आत्मानमुपजीवन् दीक्षां द्वादशवार्षिकीम् ।। ४९ ।। अश्मना चरणौ भित्त्वा गुह्यकेषु स मोदते । साधनायित्वाऽऽत्मनाऽऽत्मानं निर्द्वन्द्वो निष्परिग्रहः ।। ५० ।।

"जो मुनि केवल अपने ही सहारे जीवन-यापन करता हुआ, सुख-दुःख आदि सभी द्वंद्वों से मुक्त होकर, किसी भी सांसारिक वस्तु का संग्रह न करते हुए निष्परिग्रह रहकर, और अपने मन को पूर्णतः वश में करके बारह वर्ष की दीक्षा पूर्ण करता है, तथा अंत में पत्थर से अपने दोनों पैरों को छिन्न-भिन्न करके शरीर त्याग देता है, वह गुह्यकों यक्षों के लोक में जाकर आनंद भोगता है।"

ईस तरह भगवान शिव और देवी पार्वती जी का संवाद भीष्म पितामह महाराज युधिस्थिर को बतलाते है।


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