वाल्मीकि जी के इतिहास-ग्रन्थ रामायण के अनुसार श्रीराम का वर्णन और उनका लाखों वर्ष पूर्व का रामराज्य कैसा था? राजा दशरथ का राज्य कैसा था? | आर्यावर्त इतिहास संस्थान

आर्यावर्त इतिहास

वाल्मीकि जी के इतिहास-ग्रन्थ रामायण के अनुसार श्रीराम का वर्णन और उनका लाखों वर्ष पूर्व का रामराज्य कैसा था? राजा दशरथ का राज्य कैसा था? — त्रेतायुग का इतिहास। shree-ram-ka-itihas-aur-shree-ram-rajya-ka-itihas

राम मंदिर के विषय में बहुत राजनीति हुई। न्यायालयों में यह भी कहा गया कि श्रीराम काल्पनिक हैं। रामजन्मभूमि के लिए अब तक हजारों लोगों ने अपने जीवन की आहुति दे दी थी। किन्तु धर्मात्माओं और महापुरुषों के लगभग ५०० वर्ष के कठिन परिश्रम और संघर्ष के पश्चात् पुनः राम मंदिर का निर्माण हो गया।

परंतु इतना पर्याप्त नहीं है। हमें श्रीराम के गुणों और उनके आदर्शों को भी जनसामान्य में स्थापित करने के प्रयास करने चाहिए। इसीलिए लाखों वर्ष पूर्व श्रीराम और उनके राज्य का इतिहास जानने का प्रयास करेंगे।

श्रद्धा, आस्था या विश्वास इतिहास नहीं बनते हैं और इनसे धर्म भी सिद्ध नहीं होता। इतिहास बनता है प्रामाणिक तथ्यों से। सबसे पहले आपको श्रीराम के विषय में बताना चाहूँगा। उनके इतिहास के विषय में प्रामाणिक वही माना जा सकता है जो समकालीन हो। ऐसे महापुरुष थे महर्षि वाल्मीकि जी महाराज। उन्होंने श्रीराम के जीवनकाल में रामायण नामक इतिहास-ग्रंथ लिखा। देवर्षि नारद द्वारा श्रीराम के गुणों के विषय में विशेष जानकारी दिए जाने पर।

मेरे पास वाल्मीकि रामायण है, जो गीता प्रेस, गोरखपुर से प्रकाशित है। मैं केवल उन्हीं के शब्दों को बताऊँगा और उनका हिन्दी अर्थ बताऊँगा। एक दिवस जब देवर्षि नारद महर्षि वाल्मीकि जी के आश्रम में आए। एक बात और भी बता दूँ कि ऐसा नहीं था कि महर्षि वाल्मीकि श्रीराम जी को नहीं जानते थे। अपने वनगमन के समय श्रीराम जी महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में भी गए थे। फिर भी नारद जी परिव्राजक थे, भ्रमण करते थे, अत्यन्त बड़े विद्वान थे। अतः जब नारद जी का आगमन हुआ।

वाल्मीकि जी का नारद जी से उत्सुकतापूर्वक प्रश्न पूछना:

तो महर्षि वाल्मीकि जी नारद जी से प्रश्न करते हैं कि:

को न्वस्मिन् साम्प्रतं लोके गुणवान् कश्च वीर्यवान्। धर्मज्ञश्च कृतज्ञश्च सत्यवाक्यो दृढव्रतः॥२॥

इस वर्तमान संसार में कौन गुणवान, वीर्यवान, धर्मज्ञ, कृतज्ञ, सत्यवाक्य और दृढ़व्रती है?॥२॥

कुछ लोग वाल्मीकि रामायण के विषय में कहते हैं कि महर्षि वाल्मीकि ने उसे श्रीराम के जन्म से १०,००० वर्ष पूर्व लिख दिया था। उन्होंने वास्तव में वाल्मीकि रामायण को देखा ही नहीं है।

यहाँ कहा जा रहा है — "को न्वस्मिन् साम्प्रतं लोके", अर्थात् वर्तमान समय में इस लोक में कौन ऐसा गुणवान है, जो वीर्यवान, पराक्रमी और तेजस्वी है; उपकारों को मानने वाला है; जो सत्यव्रती है, सत्य ही बोलता है और सत्य को ही मानता है।

चारित्रेण च को युक्तः सर्वभूतेषु को हितः। विद्वान् कः कः समर्थश्च कश्चैकप्रियदर्शनः॥

कौन चरित्रवान है, सभी प्राणियों का हित करने वाला है, विद्वान है, समर्थ है और जिसका दर्शन सभी को प्रिय लगता है? ॥३॥

और ऐसा कौन मनुष्य है जो समस्त प्राणियों का हितचिन्तन करता है? कौन ऐसा है जो समस्त शास्त्रों को पूर्ण रूप से जानता है तथा उनके विज्ञान को भी जानता है? कौन सामर्थ्यवान है? और कौन ऐसा है जो अत्यन्त सुन्दर तथा प्रियदर्शी है?

आत्मवान् को जितक्रोधो द्युतिमान् कोऽनसूयकः। कस्य बिभ्यति देवाश्च जातरोषस्य संयुगे॥४॥

कौन आत्मसंयमी, क्रोधविजयी, तेजस्वी और दोषदृष्टिरहित है? तथा युद्ध में क्रोधित होने पर किससे देवता भी भय करते हैं?॥ ४॥

कौन ऐसा है जिसे आत्मसंयम है, अपने ऊपर संयम रखने वाला है? कौन ऐसा है जिसने क्रोध को जीत लिया है, जिसे क्रोध नहीं आता? कौन ऐसा है जो तेजस्वी है, जो किसी के गुणों में कभी दोष नहीं देखता? कौन ऐसा है जो जब संग्राम में खड़ा हो जाए, तो देवताओं को भी भयभीत कर सकता है?

महर्षि नारद जी का वाल्मीकि जी को इन गुणों से युक्त पुरुष के विषय में बताना :

महर्षि वाल्मीकि जी ने यह सब प्रश्न पूछे तो महर्षि नारद जी कहते हैं: आपने जिन दुर्लभ गुणों का वर्णन किया है, विचार करके मैं ऐसे मनुष्य के विषय में आपको बता रहा हूँ।

इक्ष्वाकुवंशप्रभवो रामो नाम जनैः श्रुतः। नियतात्मा महावीर्यो द्युतिमान् धृतिमान् वशी॥८॥

इक्ष्वाकु वंश में उत्पन्न राम नाम वाले पुरुष जनसमूह में प्रसिद्ध हैं। वे संयमी, महान पराक्रमी, तेजस्वी, धैर्यवान और इन्द्रिय-विजयी हैं। ८॥

वह पुरुष इक्ष्वाकु वंश में उत्पन्न हुआ है। राजा इक्ष्वाकु, जो आर्यावर्त के प्रथम राजा थे, उनके वंश में जन्मे उस पुरुष को लोग राम नाम से जानते हैं। वह संयतात्मा है, महावीर है, कान्तिमान और तेजस्वी है, धैर्यवान है तथा जितेन्द्रिय है।

बुद्धिमान् नीतिमान् वाग्मी श्रीमान् शत्रुनिबर्हणः। विपुलांसो महाबाहुः कम्बुग्रीवो महाहनुः॥९॥

वे बुद्धिमान, नीतिमान, वाग्मी, श्रीसम्पन्न, शत्रुओं का नाश करने वाले, विशाल कन्धों वाले, बड़ी भुजाओं वाले, शंख के समान ग्रीवा वाले तथा विशाल हनु वाले हैं।॥ ९॥

वे बुद्धिमान हैं, नीतिशास्त्र के पूर्ण ज्ञाता हैं, उत्तम वक्ता हैं तथा शत्रुओं और दुष्टों का नाश करने वाले हैं। जिनके कंधे अत्यन्त चौड़े हैं, भुजाएँ विशाल हैं और ग्रीवा शंख के समान सुगठित है।

महोरस्को महेष्वासो गूढजत्रुररिन्दमः। आजानुबाहुः सुशिराः सुललाटः सुविक्रमः॥१०॥

वे विशाल वक्षस्थल वाले, महान धनुर्धर, मांस से ढकी हंसली वाले, शत्रुदमनकर्ता, घुटनों तक लम्बी भुजाओं वाले, सुन्दर सिर वाले, सुन्दर ललाट वाले तथा महान पराक्रम वाले हैं।॥ १०॥

उनका वक्षस्थल चौड़ा है और वे शत्रुओं का दमन करने वाले हैं। उनकी भुजाएँ घुटनों तक लंबी हैं, मस्तक अत्यन्त सुन्दर है, ललाट भव्य है और उनकी चाल अत्यन्त मनोहर है।

समः समविभक्तांगः स्निग्धवर्णः प्रतापवान्। पीनवक्षा विशालाक्षो लक्ष्मीवान् शुभलक्षणः॥११॥

वे समस्वभाव वाले, समानुपातिक अंगों वाले, कान्तिमय वर्ण वाले, प्रतापी, पुष्ट वक्षस्थल वाले, विशाल नेत्रों वाले, लक्ष्मी से युक्त तथा शुभ लक्षणों वाले हैं।॥ ११॥

उनका शरीर सुडौल है, वर्ण स्निग्ध है, वे अत्यन्त प्रतापी हैं। उनका वक्षस्थल अत्यन्त मांसल है, नेत्र बड़े और सुन्दर हैं तथा वे शुभ लक्षणों से युक्त हैं।

यह तो नारद जी ने श्रीराम के शरीर का वर्णन किया, किन्तु केवल शरीर से मनुष्य महान नहीं होता। फिर नारद जी उनके चरित्र के विषय में कहते हैं:

धर्मज्ञः सत्यसंधश्च प्रजानां च हिते रतः। यशस्वी ज्ञानसम्पन्नः शुचिर्वश्यः समाधिमान्॥१२॥

वे धर्मज्ञ, सत्यप्रतिज्ञ, प्रजा के हित में रत, यशस्वी, ज्ञानसम्पन्न, शुद्ध, इन्द्रियनियंत्रित तथा एकाग्रचित्त हैं।॥ १२ ॥

जो धर्म को पूर्ण रूप से जानने वाले हैं, अर्थात् सनातन धर्म के पूर्ण ज्ञाता हैं, और जिनका लक्ष्य सदैव सत्य है तथा जो सम्पूर्ण रूप से प्रजा के हित में रत रहते हैं। वे यशस्वी हैं, वेदों और शास्त्रों के विज्ञान से परिपूर्ण हैं, जिनका जीवन पवित्र है, जो अपनी इन्द्रियों को वश में रखने वाले हैं, जो प्रत्येक समय समाधि में लीन रहते हैं, जो जाग्रत अवस्था में भी परमपिता परमात्मा का साक्षात्कार किए रहते हैं, अर्थात् उन्हें प्रत्येक क्षण ईश्वर का साक्षात् अनुभव होता रहता है, तथा जो पदानुसार व्यवहार करने वाले हैं।

प्रजापतिसमः श्रीमान् धाता रिपुनिषूदनः। रक्षिता जीवलोकस्य धर्मस्य परिरक्षिता॥१३॥

वे प्रजापति के समान, श्रीसम्पन्न, पालनकर्ता, शत्रुओं का संहार करने वाले, जीवलोक के रक्षक तथा धर्म के पूर्ण रक्षक हैं।॥ १३ ॥

प्रजापति के समान अपनी प्रजा का पालन करने वाले हैं, अर्थात् जैसे पिता परिवार का पालन करता है, वैसे ही वे समस्त प्राणियों का पालन करने वाले हैं। शत्रुओं का विनाश करने वाले तथा समस्त जीवलोकों के रक्षक हैं। केवल मनुष्यों के ही नहीं, अपितु सभी प्राणियों के रक्षक हैं।

रक्षिता स्वस्य धर्मस्य स्वजनस्य च रक्षिता। वेदवेदांगतत्त्वज्ञो धनुर्वेदे च निष्ठितः॥१४॥

वे अपने धर्म की रक्षा करने वाले, अपने जनों की रक्षा करने वाले, वेद और वेदाङ्ग के तत्त्वज्ञ तथा धनुर्वेद में निष्ठित हैं।॥ १४ ॥

अपने धर्म की रक्षा करने वाले हैं, अपने समस्त परिजनों की रक्षा करने वाले हैं तथा अपनी सम्पूर्ण प्रजा की रक्षा करने वाले हैं। वे वेदों और वेदाङ्गों के विज्ञान को पूर्ण रूप से जानने वाले हैं तथा धनुर्वेद में प्रवीण हैं और उसके ज्ञाता महान वैज्ञानिक हैं।

सर्वशास्त्रार्थतत्त्वज्ञः स्मृतिमान् प्रतिभानवान्। सर्वलोकप्रियः साधुरदीनात्मा विचक्षणः॥१५॥

वे सभी शास्त्रों के अर्थ और तत्त्व को जानने वाले, स्मृतिमान, प्रतिभाशाली, सर्वप्रिय, सज्जन, अदीनात्मा तथा विवेकी हैं।॥ १५ ॥

जो भी शास्त्र हैं, उनके वास्तविक तत्त्व को जानने वाले हैं, जिनकी स्मरणशक्ति विलक्षण है, जो प्रतिभासम्पन्न हैं, जो साधु, सरल और समस्त प्राणियों को प्रिय हैं। वे सभी मनुष्यों में विशिष्ट हैं।

सर्वदाभिगतः सद्भिः समुद्र इव सिन्धुभिः। आर्यः सर्वसमश्चैव सदैव प्रियदर्शनः॥१६॥

वे सज्जनों द्वारा सदा प्राप्त किए जाने वाले हैं, जैसे समुद्र नदियों द्वारा। वे आर्य, सबके प्रति समभाव रखने वाले और सदैव प्रियदर्शन हैं।॥ १६॥

वे सदैव साधु पुरुषों और सज्जनों से घिरे रहते हैं, जैसे समुद्र चारों ओर से नदियों से घिरा रहता है। वे आर्य हैं। वे सबके साथ समान व्यवहार करने वाले हैं, किसी का तिरस्कार अथवा अपमान नहीं करते। वे सदैव सबको सुन्दर प्रतीत होते हैं।

स च सर्वगुणोपेतः कौसल्यानन्दवर्धनः। समुद्र इव गाम्भीर्ये धैर्येण हिमवानिव॥१७॥

वे सभी गुणों से युक्त हैं, कौसल्या के आनन्द को बढ़ाने वाले हैं। गम्भीरता में समुद्र के समान और धैर्य में हिमालय के समान हैं।॥ १७॥

वे समस्त गुणों से परिपूर्ण हैं और अपनी माता कौशल्या के आनन्द को बढ़ाने वाले हैं। वे गम्भीरता में समुद्र के समान हैं, चंचल नहीं हैं, और धैर्य में हिमालय के समान हैं।

विष्णुना सदृशो वीर्ये सोमवत्प्रियदर्शनः। कालाग्निसदृशः क्रोधे क्षमया पृथिवीसमः॥१८॥

वे पराक्रम में विष्णु के समान, दर्शन में चन्द्रमा के समान प्रिय, क्रोध में कालाग्नि के समान और क्षमा में पृथ्वी के समान हैं।॥ १८॥

पराक्रम में वे भगवान विष्णु के समान हैं। विष्णु एक राजा भी थे और परमात्मा का भी एक नाम विष्णु है। वे उस विष्णु राजा के समान पराक्रमी हैं, जिनकी पत्नी का नाम लक्ष्मी था। वे चन्द्रमा के समान सुन्दर दिखाई देते हैं। उन्होंने क्रोध को जीता हुआ है और उस पर नियन्त्रण रखने वाले हैं, किन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि उन्हें क्रोध नहीं आता था। जब वे युद्ध के मैदान में खड़े हो जाते थे, तब काल के समान दिखाई देते थे। क्षमाशीलता में वे पृथ्वी के समान हैं। इस प्रकार नारद जी ने श्रीराम के बहुत से गुणों का वर्णन किया था। फिर महर्षि वाल्मीकि ने यह भी लिखा कि देवर्षि नारद ने मुझे जो बताया है, उसी के अनुसार मैं श्रीराम का इतिहास लिखता हूँ।

आप जरा सोचिए कि श्रीराम के इतने गुण हैं। रामभक्तों का कर्तव्य है कि वे अपने आदर्श, अपने पूर्वज, अपने राष्ट्रनायक, अपने विश्वनायक, मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के आदर्शों पर चलें। यही चरित्र-पूजा है, अन्यथा चित्र-पूजा और मूर्ति-पूजा केवल आडम्बर ही है। श्रीराम तो लाखों वर्ष पूर्व हो चुके हैं। उनके चित्र या मूर्ति के सामने पूजा-पाठ करने से अथवा केवल उनका नाम लेने से क्या लाभ, जब हम उनके सही इतिहास और चरित्र के विषय में ही नहीं जानते? तब उसका कोई लाभ नहीं है।

मान लीजिए कि आपने अपने पिताजी के चित्र की प्रतिदिन पूजा की, किन्तु पिताजी की एक भी बात नहीं मानी, उनके किसी भी गुण को नहीं अपनाया। तो क्या इसे पितृभक्ति कहेंगे?

आज ऐसा ही हो रहा है। हम श्रीराम का नाम बहुत जप रहे हैं, गा रहे हैं, किन्तु क्या हम आज से उनके गुणों को अपनाएँगे? क्या हम आज से सत्य बोलना प्रारम्भ कर देंगे? क्या हम आज से क्रोध को नियंत्रित करना सीख लेंगे? क्या हम वेदों का अध्ययन प्रारम्भ कर देंगे और ऋषियों के ग्रन्थों के विज्ञान को समझना प्रारम्भ कर देंगे? क्या हम प्रत्येक मनुष्य के साथ प्रेमपूर्ण व्यवहार करेंगे? क्या हम आज से अपनी इन्द्रियों को जीतने का प्रयास करेंगे?

यदि ऐसा नहीं है, तो हम स्वयं को श्रीराम का भक्त कहने के अधिकारी नहीं हैं। भले ही आप मंदिर में बहुत पूजा करें, फिर भी स्वयं को श्रीराम का भक्त कहलाने के अधिकारी नहीं हैं। जो श्रीराम के गुणों से अपने गुणों का सुधार करता है, केवल वही स्वयं को उनका भक्त कह सकता है। महापुरुषों के जीवन और उनके गुणों से अपना सुधार करना चाहिए, उसी को स्तुति कहते हैं।

श्रीराम के गुणों को अपनाकर क्या हम आज से अपनी इन्द्रियों को जीतना सीखेंगे? क्या हम अपनी कामनाओं को वश में रखेंगे? क्या गृहस्थ लोग संयमित जीवन जीना सीखेंगे? क्या ब्रह्मचारी और अविवाहित लोग आज से ब्रह्मचर्य का पालन करना सीखेंगे? हम हनुमान जी की पूजा करते हैं, किन्तु हनुमान जी के चित्र के सामने दूरदर्शन, चलदूरभाष अथवा संगणक में नग्न दृश्य देख रहे हैं। यह हनुमान जी की पूजा कैसे हो सकती है? यह पूजा नहीं है।

महाराज दशरथ के राज्य का वर्णन :

अब यह भी विचार करेंगे कि श्रीराम का राज्य कैसा था। पहले मैं श्रीराम के राज्य से पूर्व महाराज दशरथ के राज्य के विषय में बताता हूँ, जिसका वर्णन महर्षि वाल्मीकि ने किया है।

इस विषय में महर्षि वाल्मीकि जी ने जो लिखा है, वही आपको बताऊँगा। उन्होंने पहले अयोध्या नगरी का वर्णन किया है, फिर उस उत्तम नगरी में निवास करने वाले लोगों के विषय में बताया है। वाल्मीकि जी लिखते हैं कि अयोध्या में सभी मनुष्य धर्मात्मा थे और सभी अनेक शास्त्रों के विद्वान थे तथा सभी अपने-अपने प्रकार से सन्तुष्ट रहते थे।

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण, बालकाण्ड, षष्ठ सर्ग (सर्ग ६)

राजा दशरथ के शासनकाल में अयोध्या और वहाँ के नागरिकों की उत्तम स्थिति का वर्णन

तस्यां पुर्यामयोध्यायां वेदवित् सर्वसंग्रहः। दीर्घदर्शी महातेजाः पौरजानपदप्रियः॥१॥

उस अयोध्या पुरी में वेदज्ञ, सबको साथ रखने वाले, दूरदर्शी, महातेजस्वी तथा नगर और जनपद के लोगों को प्रिय थे। ॥१॥

इक्ष्वाकूणामतिरथो यज्वा धर्मपरो वशी। महर्षिकल्पो राजर्षिस्त्रिषु लोकेषु विश्रुतः॥२॥

वे इक्ष्वाकुओं में अतिरथ, यज्ञ करने वाले, धर्मपरायण, वशी, महर्षि के समान, राजर्षि तथा तीनों लोकों में प्रसिद्ध थे। ॥२॥

बलवान् निहतामित्रो मित्रवान् विजितेन्द्रियः। धनैश्च संचयैश्चान्यैः शक्रवैश्रवणोपमः॥३॥

वे बलवान्, शत्रुओं का नाश करने वाले, मित्रों से युक्त, इन्द्रियविजयी तथा धन और अन्य संचयों में शक्र एवं वैश्रवण के समान थे। ॥३॥

यथा मनुर्महातेजा लोकस्य परिरक्षिता। तथा दशरथो राजा लोकस्य परिरक्षिता॥४॥

जैसे महातेजस्वी मनु लोक की रक्षा करने वाले थे, वैसे ही राजा दशरथ भी लोक की रक्षा करने वाले थे। ॥४॥

तेन सत्याभिसंधेन त्रिवर्गमनुतिष्ठता। पालिता सा पुरी श्रेष्ठा इन्द्रेणेवामरावती॥५॥

उस सत्यसंकल्पी और त्रिवर्ग का पालन करने वाले राजा द्वारा वह श्रेष्ठ पुरी उसी प्रकार पालित थी, जैसे अमरावती इन्द्र द्वारा। ॥५॥

तस्मिन् पुरवरे हृष्टा धर्मात्मानो बहुश्रुताः। नरास्तुष्टा धनैः स्वैः स्वैरलुब्धाः सत्यवादिनः॥६॥

उस श्रेष्ठ पुर में लोग प्रसन्न, धर्मात्मा, बहुश्रुत, अपने-अपने धन से सन्तुष्ट, लोभरहित और सत्य बोलने वाले थे। ॥६॥

नाल्पसंनिचयः कश्चिदासीत् तस्मिन् पुरोत्तमे। कुटुम्बी यो ह्यसिद्धार्थोऽगवाश्वधनधान्यवान्॥७॥

उस श्रेष्ठ पुर में कोई भी अल्प संचय वाला नहीं था। प्रत्येक गृहस्थ गौ, अश्व, धन और धान्य से युक्त था तथा उसकी कामनाएँ अपूर्ण नहीं थीं। ॥७॥

कामी वा न कदर्यो वा नृशंसः पुरुषः क्वचित्। द्रष्टुं शक्यमयोध्यायां नाविद्वान् न च नास्तिकः॥८॥

अयोध्या में कहीं भी कोई कामी, कृपण या क्रूर पुरुष दिखाई नहीं देता था। वहाँ कोई अविद्वान और नास्तिक भी नहीं था। ॥८॥

सर्वे नराश्च नार्यश्च धर्मशीलाः सुसंयताः। मुदिताः शीलवृत्ताभ्यां महर्षय इवामलाः॥९॥

सभी पुरुष और स्त्रियाँ धर्मशील, भलीभाँति संयमित, प्रसन्न, शील और उत्तम आचरण से युक्त तथा महर्षियों के समान निर्मल थे। ॥९॥

नाकुण्डली नामुकुटी नास्रग्वी नाल्पभोगवान्। नामृष्टो न नलिप्तांगो नासुगन्धश्च विद्यते॥१०॥

वहाँ कोई भी कुण्डल, मुकुट और माला से रहित नहीं था। कोई अल्पभोगी, अस्वच्छ, अनुलेपन रहित अथवा सुगन्ध से रहित नहीं था। ॥१०॥

नामृष्टभोजी नादाता नाप्यनंगदनिष्कधृक्। नाहस्ताभरणो वापि दृश्यते नाप्यनात्मवान्॥११॥

वहाँ कोई अशुद्ध भोजन करने वाला, दान न देने वाला, अङ्गद और निष्क से रहित, हाथों में आभूषण रहित अथवा आत्मसंयम से रहित दिखाई नहीं देता था। ॥११॥

नानाहिताग्निर्नायज्वा न क्षुद्रो वा न तस्करः। कश्चिदासीदयोध्यायां न चावृत्तो न संकरः॥

अयोध्या में कोई भी अग्निहोत्र न करने वाला, यज्ञ न करने वाला, क्षुद्र, चोर, सदाचार रहित अथवा संकर नहीं था। ॥१२॥

स्वकर्मनिरता नित्यं ब्राह्मणा विजितेन्द्रियाः। दानाध्ययनशीलाश्च संयताश्च प्रतिग्रहे ॥१३॥

ब्राह्मण सदा अपने कर्म में निरत, इन्द्रियविजयी, दान और अध्ययन में शीलवान तथा प्रतिग्रह में संयमित थे। ॥१३॥

नास्तिको नानृती वापि न कश्चिदबहुश्रुतः। नासूयको न चाशक्तो नाविद्वान् विद्यते क्वचित्॥१४॥

कहीं भी कोई नास्तिक, असत्य बोलने वाला, अल्पश्रुत, दोषदृष्टि रखने वाला, असमर्थ अथवा अविद्वान नहीं था। ॥१४॥

नाषडंगविदत्रास्ति नाव्रतो नासहस्रदः। न दीनः क्षिप्तचित्तो वा व्यथितो वापि कश्चन॥१५॥

वहाँ कोई भी वेदाङ्गों का अज्ञाता, व्रत रहित अथवा सहस्रदान न देने वाला नहीं था। कोई दीन, चंचलचित्त या व्यथित भी नहीं था। ॥१५॥

कश्चिन्नरो वा नारी वा नाश्रीमान् नाप्यरूपवान्। द्रष्टुं शक्यमयोध्यायां नापि राजन्यभक्तिमान्॥१६॥

अयोध्या में कोई पुरुष या स्त्री श्री से रहित, रूप से रहित अथवा राजा के प्रति भक्तिरहित दिखाई नहीं देता था। ॥१६॥

वर्णेष्वग्र्यचतुर्थेषु देवतातिथिपूजकाः। कृतज्ञाश्च वदान्याश्च शूरा विक्रमसंयुताः॥१७॥

चारों श्रेष्ठ वर्णों के लोग देवताओं और अतिथियों का पूजन करने वाले, कृतज्ञ, उदार, वीर तथा विक्रम से युक्त थे। ॥१७॥

दीर्घायुषो नराः सर्वे धर्मं सत्यं च संश्रिताः। सहिताः पुत्रपौत्रैश्च नित्यं स्त्रीभिः पुरोत्तमे॥१८॥

उस श्रेष्ठ पुर में सभी पुरुष दीर्घायु थे, धर्म और सत्य का आश्रय लेने वाले थे तथा सदा पुत्रों, पौत्रों और स्त्रियों के साथ रहते थे। ॥१८॥

क्षत्रं ब्रह्ममुखं चासीद् वैश्याः क्षत्रमनुव्रताः। शूद्राः स्वकर्मनिरतास्त्रीन् वर्णानुपचारिणः॥१९॥

क्षत्रिय ब्राह्मण को प्रमुख मानने वाले थे। वैश्य क्षत्रियों का अनुसरण करने वाले थे। शूद्र अपने कर्म में निरत तथा तीनों वर्णों की सेवा करने वाले थे। ॥१९॥

सा तेनेक्ष्वाकुनाथेन पुरी सुपरिरक्षिता। यथा पुरस्तान्मनुना मानवेन्द्रेण धीमता॥२०॥

वह पुरी उस इक्ष्वाकुनाथ द्वारा उसी प्रकार भलीभाँति रक्षित थी, जैसे पूर्वकाल में बुद्धिमान मानवेन्द्र मनु द्वारा। ॥२०॥

तां पुरीं स महातेजा राजा दशरथो महान्। शशास शमितामित्रो नक्षत्राणीव चन्द्रमाः॥२७॥

महातेजस्वी, महान और शत्रुओं को शान्त करने वाले राजा दशरथ उस पुरी पर वैसे ही शासन करते थे, जैसे चन्द्रमा नक्षत्रों पर। ॥२७॥

तां सत्यनामां दृढतोरणार्गलां गृहैर्विचित्रैरुपशोभितां शिवाम्। पुरीमयोध्यां नृसहस्रसंकुलां शशास वै शक्रसमो महीपतिः॥२८॥

सत्य नाम वाली, दृढ़ तोरणों और अर्गलों से युक्त, विचित्र गृहों से सुशोभित, मंगलमयी तथा सहस्रों मनुष्यों से संकुल अयोध्या पुरी पर शक्र के समान राजा शासन करते थे। ॥२८॥

अगर आज के भारत देश में इस प्रकार के लोग हो जाएँ, तो उस भारत में कोई भी मनुष्य दुःखी नहीं होगा, कोई भी पशु दुःखी नहीं होगा, वधशालाएँ नहीं रहेंगी, मछलियों को नहीं मारा जाएगा, सूअरों को नहीं मारा जाएगा, कोई पापी नहीं रहेगा, कोई भी वेदों का विद्वान नहीं है ऐसा नहीं होगा, प्रत्येक मनुष्य वेदों और शास्त्रों का विद्वान होगा, और कोई भी लोभी नहीं होगा। कोई भी पराए धन का लोभ नहीं करेगा। यदि ऐसा होगा, तो समझेंगे कि दशरथ जी के राज्य के कुछ लक्षण आ गए।

अयोध्या में कोई ऐसा नहीं था जिसके पास प्रचुर मात्रा में धन न हो। अयोध्या में कोई कामी नहीं था। कोई ऐसा व्यक्ति नहीं था जो लम्पट हो। आज अपने-अपने हृदयों में झाँकें कि हमारे मन में क्या-क्या भाव आते हैं, चौबीसों घंटे में स्वप्न में क्या देखते हैं, जाग्रत अवस्था में क्या सोचते हैं, क्या करते हैं और क्या देखते हैं। क्या रामराज्य आएगा?

उनके राज्य में कोई कामी नहीं था, कोई कृपण नहीं था। सभी उदार हृदय वाले और दानी थे। कोई मूर्ख नहीं था, सभी विद्वान थे। कोई नास्तिक नहीं था, ऐसा कोई नहीं था जिसकी ईश्वर में आस्था न हो। सभी स्त्री-पुरुष सदा प्रसन्न रहने वाले थे, सदाचारी थे और ऋषि-महर्षियों की भाँति निर्मल तथा पवित्र चरित्र वाले थे।

कोई ऐसा नहीं था जो स्वर्णाभूषण धारण नहीं करता हो। कोई ऐसा नहीं था जिसे भोजन और पेय की कमी हो। कोई ऐसा नहीं था जो शरीर से, वस्त्र से अथवा मन से मलिन हो। अयोध्या में कोई ऐसा नहीं था जो नित्य यज्ञ नहीं करता हो। कोई चोर नहीं था, कोई दुराचारी नहीं था, कोई असत्य बोलने वाला नहीं था, कोई दूसरों के दोष खोजने वाला नहीं था। कोई ऐसा नहीं था जो वेद और उसके समस्त अंगों को नहीं जानता हो। कोई रोगी नहीं था। सभी मिलकर अपने धर्म का पालन करते थे। महाराज दशरथ जी के समय में अयोध्या का राज्य ऐसा था।

श्रीराम के राज्य का वर्णन : युद्धकाण्ड, सर्ग १२८

अब श्रीराम जी के समय में कैसा राज्य था, उसके विषय में जानते हैं।

राज्यन् दशसहस्राणि प्राप्य वर्षाणि राघवः । शताश्वमेधानाजह्रे सदश्वान्भूरिदक्षिणान् ॥९५॥

राघव ने दस सहस्र वर्ष राज्य करके उत्तम अश्वों वाले और बहुत दक्षिणा वाले सौ अश्वमेध यज्ञ किए। ॥९५॥

आजानुलम्बिबाहुः स महावक्षाः प्रतापवान् । लक्ष्मणानुचरो रामः शशास पृथिवीमिमाम् ॥९६॥

वे घुटनों तक लम्बी भुजाओं वाले, विशाल वक्षस्थल वाले, प्रतापवान् तथा लक्ष्मण के साथ रहने वाले राम इस पृथ्वी पर शासन करते थे। ॥९६॥

राघवश्चापि धर्मात्मा प्राप्य राज्यमनुत्तमम् । ईजे बहुविधैर्यज्ञैः ससुतभ्रातृबान्धवः ॥९७॥

धर्मात्मा राघव ने उत्तम राज्य प्राप्त करके पुत्रों, भाइयों और बान्धवों सहित अनेक प्रकार के यज्ञ किए। ॥९७॥

न पर्यदेवन्विधवा न च व्यालकृतं भयम् । न व्याधिजं भयं चासीत् रामे राज्यं प्रशासति ॥९८॥

राम के राज्य करते समय विधवाएँ विलाप नहीं करती थीं, न हिंसक पशुओं का भय था और न रोगों का भय था। ॥९८॥

निर्दस्युरभवल्लोको नानर्थः कश्चिदस्पृशत् । न च स्म वृद्धा बालानां प्रेतकार्याणि कुर्वते ॥९९॥

लोक दस्युओं से रहित था, कोई अनर्थ किसी को स्पर्श नहीं करता था, और वृद्ध लोग बालकों के प्रेतकार्य नहीं करते थे। ॥९९॥

सर्वं मुदितमेवासीत् सर्वो धर्मपरोऽभवत् । राममेवानुपश्यन्तो नाभ्यहिंसन् परस्परम् ॥१००॥

सब लोग प्रसन्न थे, सभी धर्मपरायण थे, राम को ही आदर्श मानते हुए वे परस्पर हिंसा नहीं करते थे। ॥१००॥

आसन् वर्षसहस्राणि तथा पुत्रसहस्रिणः । निरामया विशोकाश्च रामे राज्यं प्रशासति ॥१०१॥

राम के राज्य करते समय लोग सहस्रों वर्ष तक जीवित रहते थे, सहस्रों पुत्रों वाले थे, निरोग थे और शोक से रहित थे। ॥१०१॥

रामो रामो राम इति प्रजानामभवन् कथाः । रामभूतं जगदभूद् रामे राज्यं प्रशासति ॥१०२॥

राम के राज्य करते समय प्रजाओं की कथाओं में केवल ‘राम, राम, राम’ ही था, और समस्त जगत राममय हो गया था। ॥१०२॥

नित्यपुष्पा नित्यफलाः तरवस्तत्र निर्वृणाः । कालवर्षी च पर्जन्यः सुखस्पर्शश्च मारुतः ॥१०३॥

वहाँ वृक्ष सदा पुष्पों और फलों से युक्त थे, पर्जन्य समय पर वर्षा करता था और मारुत सुखद स्पर्श वाला था। ॥१०३॥

ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्रा लोभविवर्जिताः । स्वकर्मसु प्रवर्तन्ते तुष्ठाः स्वैरेव कर्मभिः ॥१०४॥

ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र लोभ से रहित थे, अपने-अपने कर्मों में प्रवृत्त रहते थे और अपने कर्मों से ही सन्तुष्ट थे। ॥१०४॥

आसन् प्रजा धर्मपरा रामे शासति नानृताः । सर्वे लक्षणसम्पन्नाः सर्वे धर्मपरायणाः । दशवर्षसहस्राणि रामो राज्यमकारयत् ॥१०५-१०६॥

राम के शासन में प्रजाएँ धर्मपरायण थीं, असत्य बोलने वाली नहीं थीं, सभी उत्तम लक्षणों से युक्त और धर्मपरायण थीं। राम ने दस सहस्र वर्ष तक राज्य किया। ॥१०५-१०६॥

महर्षि वाल्मीकि ने युद्धकाण्ड के अन्त में लिखा है कि श्रीराम के राज्य में कोई विधवा नहीं होती थी, और सर्प आदि का भी कोई भय नहीं था। किसी प्रकार के कोई रोग नहीं थे। लुटेरों का भय नहीं था, कोई पाप नहीं करता था। बच्चों की अकाल मृत्यु नहीं होती थी, अर्थात् वृद्धों को उनकी अन्त्येष्टि नहीं करनी पड़ती थी।

सभी लोग परस्पर एक-दूसरे को देखकर प्रसन्न रहा करते थे। सभी धर्मपरायण थे। श्रीराम प्रत्येक क्षण प्रजा पर दृष्टि रखते थे। और कभी कोई किसी को कष्ट नहीं पहुँचाता था। सभी निर्दोष होते थे। श्रीराम के राज्य में समस्त प्रजा धर्म के पालन में तत्पर रहती थी। ऐसा श्रीराम का राज्य था। इसी कारण आज तक लाखों वर्ष बीत जाने पर भी उस मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम को स्मरण किया जाता है।

जिस न्यास ने मंदिर का निर्माण कराया है, उसका दायित्व बनता है कि यह मंदिर केवल चित्र-पूजा तक सीमित न रहे। वहाँ वेद-वेदाङ्गों का अध्ययन कराया जाए, उन पर अनुसंधान हो। जिस धनुर्वेद में श्रीराम प्रवीण थे, उस धनुर्वेद पर अनुसंधान होना चाहिए। आधुनिक विज्ञान को वेदों के पीछे लाया जाए, वेदों द्वारा उसका मार्गदर्शन किया जाए। वाल्मीकि रामायण के इतिहास पर अनुसंधान हो।

श्रीराम के इतिहास पर अनुसंधान होना चाहिए। केवल चित्र-पूजा से कार्य नहीं होगा। हमें उनके चरित्र की पूजा करनी चाहिए और उनके चरित्र को अपने जीवन में उतारना चाहिए। तभी वह वास्तव में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की पूजा होगी। तभी वह तीर्थ सही अर्थ में तीर्थ बनेगा। तभी भारत जगद्गुरु बनेगा। तभी भारत में रामराज्य आएगा। यह हम सभी भारतीयों का कर्तव्य है कि हम श्रीराम से सीखें, उनके चरित्र से सीखें, उनका सही इतिहास जानें और उनसे अपने चरित्र का सुधार करें।

अपने प्रिय आर्यावर्त देश को पुनः जगद्गुरु बनाएँ, पुनः चक्रवर्ती बनाएँ। हम संकल्पित हों।

ॐ शान्तिः॥


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