भगवान शिव द्वारा धर्म का वर्णन उसके लक्षणों वर्णन और ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, ब्राह्मण और राज्य का धर्म विषय मे वर्णन | आर्यावर्त इतिहास संस्थान
आर्यावर्त इतिहास
भगवान शिव द्वारा धर्म का वर्णन उसके लक्षणों वर्णन और ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, ब्राह्मण और राज्य का धर्म विषय मे वर्णन | आर्यावर्त इतिहास संस्थान
महाभारत के अनुशासन पर्व मे जब भीष्म पितामह बाणों की शर-शय्या पर थे तब युधिस्थिर महाराज से भगवान शिव के और देवी उमा जी के संवाद को बतलाते है। हम भगवान शिव की पूजा करते है उनकी मूर्ति पर दूध पुष्प फल आदि अर्पण करते है लेकिन उनके अनुसार बताए हुए धर्म का अनुसरण नहीं करते तो मूर्ति की पूजा करने से कोई लाभ नहीं है। भगवती उमा जी का भगवान शिव से धर्म के विषय मे पूछना भगवन् सर्वभूतेश सर्वधर्मविदां वर । पिनाकपाणे वरद संशयो मे महानयम् ।। २० ।। धर्मः किंलक्षणः प्रोक्तः कथं वा चरितुं नरैः । शक्यो धर्ममविन्दद्भिर्धर्मज्ञ वद मे प्रभो ।। २३ ।। देवी पार्वती भगवान शिव से धर्म के विषय मे पूछते है की "हे भगवन्! हे समस्त प्राणियों के अधिपति! हे संपूर्ण धर्मों को जानने वाले मर्मज्ञों में सर्वश्रेष्ठ! हे हाथों में पिनाक धनुष धारण करने वाले वरदाता! मेरे मन में यह एक अत्यंत महान संशय उत्पन्न हुआ है। हे धर्मज्ञ! हे प्रभु! धर्म का क्या लक्षण बताया गया है? और धर्म को न जानने वाले मनुष्यों द्वारा इसका आचरण किस प्रकार किया जा सकता है, कृपया मुझे बताएँ।" सामान्य एवं सनातन धर्म के लक्षण अहिंसा सत्यवचनं सर्वभूतान…